आज के आधुनिक दौर में हम जब चाहें, जहाँ चाहें, अपनी जेब से मोबाइल निकालकर फोटो खींच लेते हैं। शादियों में बड़े-बड़े कैमरे हों या अंतरिक्ष में लगी दूरबीन, यह सब हमारे जीवन का इतना सामान्य हिस्सा बन चुके हैं कि हम शायद ही कभी यह सोचते हैं कि इसकी शुरुआत कैसे हुई होगी। क्या आपने कभी सोचा है कि दुनिया का सबसे पहला कैमरा किसने और कैसे बनाया होगा? इतिहास के पन्नों में एक ऐसा नाम है जिसे अक्सर भुला दिया जाता है, लेकिन हकीकत यह है कि आज की फोटोग्राफी और विज्ञान की दुनिया उसी शख्स की कर्जदार है। वह नाम है 11वीं सदी के महान वैज्ञानिक इब्न अलहैथम, जिन्हें पश्चिम में ‘अल-हज़ेन’ के नाम से भी जाना जाता है।

इब्न अल-हैथम कौन थे?

इस कहानी की शुरुआत होती है आज से लगभग एक हजार साल पहले, यानी सन 965 ईसवी में, जब इराक के बसरा शहर में इब्न अल-हैथम का जन्म हुआ। वह दौर ‘इस्लाम के स्वर्ण युग’ का दौर था, जब विज्ञान, कला और दर्शन अपनी ऊँचाइयों पर थे। इब्न अल-हैथम बचपन से ही बहुत जिज्ञासु थे। वे किसी भी बात को सिर्फ इसलिए नहीं मानते थे क्योंकि वह किसी बड़े आदमी ने कही है, बल्कि वे हर चीज़ का सबूत मांगते थे। इसी आदत ने उन्हें आगे चलकर दुनिया का ‘पहला सच्चा वैज्ञानिक’ बनाया।

नील नदी और एक सजा जो वरदान बन गई

उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब उन्हें मिस्र के तत्कालीन शासक (खलीफा) ने एक काम के लिए बुलाया। खलीफा चाहते थे कि इब्न अल-हैथम नील नदी में आने वाली बाढ़ को रोकने का कोई तरीका निकालें। इब्न अल-हैथम ने जब वहां जाकर देखा, तो उन्हें समझ आ गया कि उस समय की तकनीक से यह काम करना नामुमकिन है। लेकिन समस्या यह थी कि खलीफा बहुत गुस्सैल स्वभाव का था। अपनी जान बचाने के लिए इब्न अल-हैथम ने पागलपन का नाटक किया। नतीजतन, खलीफा ने उन्हें मारने के बजाय काहिरा में उनके ही घर में नज़रबंद (House Arrest) कर दिया। उन्हें कई सालों तक बाहरी दुनिया से कटकर एक कमरे में अकेले रहना पड़ा।

यही वह समय था जब इतिहास रचा गया। दुनिया की नज़र में वे एक कैदी थे, लेकिन असल में वह एक ऐसी प्रयोगशाला में बैठे थे जहाँ से प्रकाशिकी (Optics) का एक नया अध्याय शुरू होने वाला था।

चित्र1: इब्नअल-हैथम काहिरा में अपने अंधेरे कमरे में, खिड़की के एक छोटे सेछेद सेआती रोशनी को देखते हुए।

अंधेरे कमरे का जादू: कैमरा ऑब्स्कुरा की खोज

जब इब्न अल-हैथम अपनी कैद में थे, तो उनका कमरा पूरी तरह अंधेरे में रहता था। एक दिन दोपहर के समय उन्होंने देखा कि उनकी खिड़की के शटर में एक बहुत बारीक छेद (सूराख) है। बाहर सूरज चमक रहा था और उस छोटे से छेद से रोशनी की एक पतली किरण कमरे के अंदर आ रही थी।

तभी उनकी नज़र सामने वाली दीवार पर पड़ी और वे हैरान रह गए। उस छोटे से छेद से गुज़रने वाली रोशनी ने सामने वाली दीवार पर बाहर के नज़ारे की एक तस्वीर बना दी थी। बाहर के पेड़, इमारतें और लोग सब कुछ दीवार पर दिखाई दे रहे थे, लेकिन एक अजीब बात थी—वह सारी तस्वीर उल्टी (Inverted) थी। पेड़ का ऊपरी हिस्सा नीचे और निचला हिस्सा ऊपर दिख रहा था।

चित्र2: इब्नअल-हैथम दीवार पर बनी उल्टी तस्वीर को देखकर आश्चर्यचकित होते हुए, जो उनकी महान खोजका क्षण था।

आम इंसान होता तो इसे चमत्कार मानकर छोड़ देता, लेकिन इब्न अल-हैथम एक वैज्ञानिक थे। उन्होंने इस पर गहरा चिंतन किया और समझा कि प्रकाश हमेशा सीधी रेखा (Straight Line) में यात्रा करता है। जब प्रकाश की किरणें किसी वस्तु के ऊपर और नीचे के हिस्से से निकलकर एक बहुत छोटे छेद से गुज़रती हैं, तो वे उस छेद के अंदर एक-दूसरे को काटती (Cross) हैं। इसी वजह से जो किरण ऊपर से आ रही थी, वह छेद से निकलकर नीचे चली गई और जो नीचे से आ रही थी, वह ऊपर चली गई। इसी कारण दीवार पर तस्वीर उल्टी बनी।

उन्होंने इस प्रयोग के लिए जिस अंधेरे कमरे का इस्तेमाल किया, उसे अरबी भाषा में उन्होंने कमरा’ (Qamara) कहा, जिसका मतलब होता है ‘अंधेरा कक्ष’। जब उनकी किताबें यूरोप पहुंचीं और लैटिन भाषा में अनुवादित हुईं, तो यही ‘कमरा’ शब्द ‘Camera Obscura’ (डार्क चैंबर) बन गया। और आज हम जिसे ‘कैमरा’ कहते हैं, वह शब्द सीधे तौर पर इब्न अल-हैथम के उसी अरबी शब्द ‘कमरा’ से निकला है।

हमारी आँखों का रहस्य: हम कैसे देखते हैं?

इब्न अल-हैथम ने सिर्फ कैमरा ही नहीं बनाया, बल्कि उन्होंने इंसान को यह भी समझाया कि वह देखता कैसे है। उनसे पहले, यूनान के बड़े-बड़े विद्वान जैसे प्लेटो और यूक्लिड यह मानते थे कि हमारी आँखों के अंदर से टॉर्च की तरह रोशनी निकलती है जो चीज़ों पर पड़ती है, और तब हमें चीज़ें दिखाई देती हैं।

इब्न अल-हैथम ने अपनी प्रसिद्ध किताब ‘किताब अल-मनाज़िर’ (Book of Optics) में इस सदियों पुरानी धारणा को गलत साबित किया। उन्होंने गणित और सबूतों के साथ बताया कि रोशनी हमारी आँखों से नहीं निकलती, बल्कि बाहर से (जैसे सूरज या दीपक से) वस्तुओं पर पड़ती है, और वहाँ से टकराकर (Reflect होकर) हमारी आँखों में आती है। तब जाकर हमारे दिमाग में छवि बनती है। यह वही सिद्धांत है जिसे आज का आधुनिक विज्ञान मानता है।

चित्र3: इब्नअल-हैथमअपनी खोज का दस्तावेजीकरण करते हुए, एकआरेख(diagram) बना रहे हैं कि कैसे प्रकाश की किरणें एक छोटे छेद से गुजर कर उल्टी छवि बनाती हैं।

एक विरासत जो आज भी ज़िंदा है

इब्न अल-हैथम द्वारा खोजा गया ‘पिनहोल कैमरा’ का सिद्धांत ही वह आधार बना, जिस पर आगे चलकर 19वीं सदी में फोटोग्राफिक कैमरे बने। फर्क सिर्फ इतना आया कि इब्न अल-हैथम ने तस्वीर को दीवार पर देखा था, और बाद के वैज्ञानिकों ने उस तस्वीर को रील और सेंसर पर कैद करना सीख लिया। इतना ही नहीं, उन्होंने कांच के गोल टुकड़ों (लेंस) पर भी काम किया, जिससे यह पता चला कि चीजों को बड़ा करके कैसे देखा जा सकता है। उनकी इसी खोज ने आगे चलकर चश्मे, माइक्रोस्कोप और दूरबीन के आविष्कार का रास्ता साफ किया।

तो, अगली बार जब आप अपने फोन से कोई सेल्फी लें या किसी खूबसूरत नज़ारे को कैद करें, तो एक पल के लिए उस मुस्लिम वैज्ञानिक को ज़रूर याद करें जिसने एक अंधेरे कमरे में कैद होकर भी दुनिया को रोशनी देखने का सही तरीका सिखाया। इब्न अल-हैथम की कहानी हमें सिखाती है कि जिज्ञासा और सोचने की शक्ति से इंसान अंधेरे में भी नई राहें खोज सकता है।

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